मंगलवार, 17 मार्च 2026
अमेठी

बिटिया की शादी और खाली सिलेंडर! दिनभर लाइन में लगा रहा लाचार पिता, आखिर लकड़ी के चूल्हे पर बनीं मिठाइयां

By Uttar World Desk

11 मा, 2026 | 09:02 बजे
बिटिया की शादी और खाली सिलेंडर! दिनभर लाइन में लगा रहा लाचार पिता, आखिर लकड़ी के चूल्हे पर बनीं मिठाइयां

अमेठी: उत्तर प्रदेश में गहराता जा रहा घरेलू गैस (LPG) का संकट अब खुशियों के घरों में भी अंधेरा और परेशानी लेकर आ रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी युद्ध और सप्लाई चैन में आई बाधाओं का सबसे दर्दनाक चेहरा अमेठी जिले में देखने को मिला। यहाँ एक लाचार पिता अपनी बेटी की शादी से महज कुछ घंटे पहले गैस सिलेंडर के लिए सुबह से रात तक कतार में खड़ा रहा, लेकिन उसे खाली हाथ लौटना पड़ा।

मामला अमेठी तहसील के डेढ़ पसार गांव का है। यहाँ रहने वाले रविंद्र नाथ तिवारी की बेटी की शादी अगले दिन तय है। घर में मेहमानों का आना-जाना शुरू हो गया है और शादी की रस्मों के बीच पकवान बनाने की तैयारियां चरम पर थीं। सुबह-सुबह हलवाई भी अपने साजो-सामान के साथ पहुंच गया, लेकिन रसोई में सबसे जरूरी चीज—गैस सिलेंडर—नदारद था।

बेटी की विदाई में कोई कमी न रह जाए, इस चिंता में डूबे रविंद्र नाथ तिवारी सुबह सूरज निकलने से पहले ही गैस एजेंसी पहुँच गए। हाथ में बुकिंग की रसीद थी, लेकिन आँखों में अनिश्चितता का डर। रविंद्र नाथ पूरे दिन भूखे-प्यासे एजेंसी के बाहर लंबी लाइन में खड़े रहे। इस दौरान घर की अन्य सभी जिम्मेदारियां पीछे छूट गईं। उन्हें उम्मीद थी कि शाम तक तो सिलेंडर मिल ही जाएगा, लेकिन घंटों के इंतजार के बाद भी एजेंसी की ओर से 'स्टॉक खत्म' का जवाब मिला।

उधर घर पर हलवाई घंटों तक गैस आने का इंतजार करता रहा। जब सूरज ढल गया और रविंद्र नाथ खाली हाथ घर लौटे, तो परिवार के सामने बड़ा संकट खड़ा हो गया। शादी की मिठाइयां और पकवान समय पर तैयार नहीं होते तो मेहमानों के सामने शर्मिंदगी उठानी पड़ती। अंततः, कोई विकल्प न देख हलवाई ने पुराने पारंपरिक तरीके—लकड़ी के चूल्हे—का सहारा लिया। धुएं के बीच आँगन में चूल्हा जलाया गया और शादी की मिठाइयां बनाने का काम शुरू हुआ।

अपनी बेबसी जाहिर करते हुए रविंद्र नाथ तिवारी ने कहा, "बुकिंग कराने के बावजूद हमें सिलेंडर नहीं मिल रहा है। कल बेटी की बारात आनी है, ऐसे में इज्जत का सवाल है। अगर लकड़ी का चूल्हा न जलता तो हम मेहमानों को क्या खिलाते?" गांव के अन्य लोगों का भी आरोप है कि एजेंसियां मनमानी कर रही हैं और जरूरतमंदों को सिलेंडर देने के बजाय स्टॉक दबाकर बैठी हैं।

हैरानी की बात यह है कि जहाँ आम आदमी एक-एक सिलेंडर के लिए तरस रहा है, वहीं जिले के जिम्मेदार अधिकारी सब कुछ सामान्य बता रहे हैं। जिला पूर्ति अधिकारी (DSO) शशिकांत का कहना है कि अमेठी जिले में गैस की कोई कमी नहीं है और दो से तीन दिन का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है। अब सवाल यह उठता है कि अगर स्टॉक है, तो वह आम जनता तक क्यों नहीं पहुँच रहा? क्या अधिकारी और एजेंसियां पैनिक सिचुएशन का फायदा उठा रहे हैं?

अमेठी ही नहीं, बल्कि आसपास के रायबरेली, सुल्तानपुर और प्रतापगढ़ जिलों में भी कमोबेश यही स्थिति है। शादियों के इस सीजन में गैस की किल्लत ने मध्यमवर्गीय परिवारों की कमर तोड़ दी है। लोग अब गैस के बदले पुराने चूल्हों या इंडक्शन की ओर भाग रहे हैं, लेकिन बिजली की कटौती ग्रामीण इलाकों में वहां भी बाधा पैदा कर रही है।

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