बस्ती: उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया है। जिले के स्वास्थ्य केंद्रों पर 13 और 14 साल की दो नाबालिग किशोरियों के माँ बनने का मामला दर्ज हुआ है। यह महज एक चिकित्सा आंकड़ा नहीं, बल्कि एक गहरे सामाजिक अपराध और बाल शोषण का संकेत है।
बस्ती के स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार, पिछले कुछ महीनों में कम उम्र की प्रसूताओं की संख्या में वृद्धि दर्ज की गई है। इनमें से 13 और 14 साल की किशोरियों का मामला सबसे चौंकाने वाला है। प्रारंभिक जांच में पता चला है कि ये किशोरियां न केवल शिक्षा से दूर थीं, बल्कि वे पारिवारिक और सामाजिक निगरानी के अभाव में शोषण का शिकार हुई हैं।
इन इलाकों में किशोरियों के बीच 'रिप्रोडक्टिव हेल्थ' (Reproductive Health) और जागरूक शिक्षा का भारी अभाव है। कई मामलों में परिवार को इस बात की जानकारी ही नहीं होती कि उनकी बच्चियां किस तरह के सामाजिक दायरे में हैं। बाल शोषण के इन मामलों में अक्सर आरोपी पीड़ित के करीबी या जान-पहचान के लोग होते हैं, जिससे डर के मारे मुंह नहीं खोला जाता।
बस्ती जैसे छोटे कस्बों में ऐसी घटनाओं के बाद पीड़ित बच्चियों को सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है। 'बदनामी' के डर से परिवार मामले को दबाने की कोशिश करते हैं, जिससे असली अपराधी खुलेआम घूमते रहते हैं। डॉक्टर और समाजशास्त्रियों का कहना है कि यह 'शर्म' समाज की सबसे बड़ी बीमारी है जो अपराधियों को संरक्षण देती है।
13-14 साल की उम्र में शारीरिक और मानसिक रूप से मां बनना अत्यंत जोखिम भरा होता है। इस उम्र में प्रसव के दौरान एनीमिया, प्री-एक्लेम्पसिया और प्रसव संबंधी जटिलताओं का खतरा बहुत अधिक होता है। किशोर मांओं को खुद के शरीर के विकास के लिए पोषक तत्वों की जरूरत होती है, जो गर्भावस्था के दौरान पूरी नहीं हो पाती।
पोक्सो एक्ट (POCSO Act) के तहत 18 वर्ष से कम उम्र की किसी भी किशोरी के साथ यौन संबंध बनाना अपराध है, चाहे वह सहमति से ही क्यों न हो। कानून इन मामलों में सख्त है, लेकिन जागरूकता के अभाव में रिपोर्टिंग बहुत कम होती है।