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भारत और इजरायल में कौन है वास्तव में सुरक्षित? अल जजीरा के लेख में सामाजिक भेदभाव और सुरक्षा पर उठाए गए सवाल

By Uttar World Desk

26 फ़र, 2026 | 10:57 बजे
भारत और इजरायल में कौन है वास्तव में सुरक्षित? अल जजीरा के लेख में सामाजिक भेदभाव और सुरक्षा पर उठाए गए सवाल

नई दिल्ली/तेल अवीव। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजरायल यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच बढ़ती 'राजनीतिक घनिष्ठता' दुनिया भर में चर्चा का विषय बनी हुई है। इसी पृष्ठभूमि में अल जजीरा ने सोमदीप सेन (यूनिवर्सिटी ऑफ प्रिटोरिया) का एक ओपिनियन पीस प्रकाशित किया है, जिसमें यह सवाल उठाया गया है कि क्या इन दोनों देशों में रहने वाले सभी नागरिक वास्तव में सुरक्षित हैं।

मोदी-नेतन्याहू की दोस्ती और विचारधारा का मेल

लेख में पीएम मोदी और बेंजामिन नेतन्याहू की हालिया मुलाकात का जिक्र करते हुए कहा गया कि यह दोस्ती केवल समझौतों तक सीमित नहीं है, बल्कि एक गहरी वैचारिक समानता पर आधारित है। नेतन्याहू की पत्नी सारा नेतन्याहू द्वारा मोदी के स्वागत के दौरान 'भगवा/नारंगी' रंग के कपड़े पहनने को हिंदुत्व की विचारधारा के प्रति एक सांकेतिक समर्थन के रूप में देखा गया। लेख के अनुसार, दोनों नेता खुद को इस्लाम और कट्टरपंथ के खिलाफ एक सभ्यतागत संघर्ष के स्तंभ के रूप में पेश करते हैं।

इजरायल में सुरक्षा और भेदभाव के सवाल

लेखक का तर्क है कि इजरायल खुद को यहूदियों के लिए एक सुरक्षित पनाहगाह बताता है, लेकिन वहां भी नस्लीय भेदभाव की परतें मौजूद हैं:

फिलिस्तीनी नागरिक: इजरायल में रहने वाले फिलिस्तीनी नागरिक (करीब 19%) संस्थागत भेदभाव का सामना करते हैं।

मिज़राही और इथियोपियाई यहूदी: लेख में बताया गया कि कैसे मध्य-पूर्वी और अफ्रीकी मूल के यहूदियों को भी भेदभाव का सामना करना पड़ता है। इथियोपियाई यहूदियों का एक बड़ा हिस्सा गरीबी रेखा के नीचे है और वे पुलिसिया नस्लवाद की शिकायत करते रहे हैं।

भारत के संदर्भ में उठाए गए मुद्दे

भारत के बारे में लेख में कहा गया कि जहाँ एक ओर मुस्लिम अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव की बात की जाती है, वहीं हिंदू समाज के भीतर भी सुरक्षा और समानता के स्तर अलग-अलग हैं:

जातिगत भेदभाव: लेख में दलित छात्र रोहित वेमुला के मामले का जिक्र करते हुए बताया गया कि उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति आधारित उत्पीड़न एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

सरकारी आंकड़े और वास्तविकता: यूजीसी के आंकड़ों का हवाला देते हुए लेख में कहा गया कि 2025 में जाति संबंधी शिकायतों में वृद्धि हुई है, जो दर्शाती है कि सामाजिक पदानुक्रम आज भी मजबूती से मौजूद है।

निष्कर्ष: सुरक्षा की अवधारणा पर सवाल

लेख का निष्कर्ष यह है कि इजरायल और भारत, दोनों ही देशों में सुरक्षा की गारंटी केवल उन लोगों के लिए है जो 'प्रमुख विचारधारा' (Hegemonic conception) के ढांचे में फिट बैठते हैं। लेखक के अनुसार, वास्तव में पदानुक्रम और बहिष्कार की नीतियों के कारण समाज का एक बड़ा वर्ग खुद को असुरक्षित महसूस करता है।

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