बीजिंग/तेहरान, 03 अप्रैल (उत्तर वर्ल्ड डेस्क): ईरान-अमेरिका युद्ध के 35वें दिन जहां भारत, यूरोप और अमेरिका तेल की आसमान छूती कीमतों और ठप पड़ी सप्लाई चेन से जूझ रहे हैं, वहीं चीन ने एक ऐसी रणनीति अपनाई है जिसने पूरी दुनिया के अर्थशास्त्रियों को हैरान कर दिया है। अल जजीरा की एक विशेष रिपोर्ट के मुताबिक, चीन की छोटी और स्वतंत्र रिफाइनरियों, जिन्हें 'टीपॉट रिफाइनरीज' (Teapot Refineries) कहा जाता है, ने चीन के लिए एक मजबूत सुरक्षा कवच का काम किया है।
क्या हैं ये 'टीपॉट रिफाइनरीज'?
चीन के शेडोंग प्रांत में स्थित ये छोटी और निजी तेल रिफाइनरियां 'टीपॉट' के नाम से जानी जाती हैं। ये चीन की कुल रिफाइनिंग क्षमता का लगभग 20% से 25% हिस्सा संभालती हैं। सरकारी कंपनियों (जैसे Sinopec) के विपरीत, ये रिफाइनरियां बहुत ही लचीली (Flexible) होती हैं और दुनिया के उन हिस्सों से भी तेल खरीदने में माहिर हैं जिन पर प्रतिबंध लगा हो।
चीन ने कैसे खुद को सुरक्षित किया? (Key Highlights)
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प्रतिबंधित तेल की खरीद: जब हॉर्मुज की नाकेबंदी के कारण दुनिया के लिए तेल का रास्ता बंद है, तब ये 'टीपॉट' रिफाइनरियां भारी डिस्काउंट पर ईरान और रूस से तेल खरीद रही हैं।
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समानांतर भुगतान प्रणाली: चीन ने डॉलर के बजाय अपनी मुद्रा 'युआन' और अन्य गुप्त भुगतान प्रणालियों का इस्तेमाल किया है, जिससे अमेरिकी प्रतिबंधों का उन पर कोई असर नहीं हो रहा।
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भारी स्टॉक का फायदा: युद्ध शुरू होने से पहले ही चीन ने अपनी इन छोटी रिफाइनरियों के माध्यम से तेल का विशाल भंडार (Strategic Reserves) जमा कर लिया था।
दुनिया संकट में, चीन फायदे में:
अल जजीरा की रिपोर्ट बताती है कि कुवैत की रिफाइनरी पर हमले और हॉर्मुज की नाकेबंदी के बाद जहां कच्चे तेल की कीमत $120 प्रति बैरल की ओर बढ़ रही है, चीन की ये 'टीपॉट' रिफाइनरियां अभी भी $60-$70 के भाव पर तेल प्रोसेस कर रही हैं। इससे चीन में पेट्रोल-डीजल की कीमतें स्थिर हैं, और वहां के उद्योगों पर कानपुर या भारत के अन्य शहरों जैसा बुरा असर नहीं पड़ा है।
भारत के लिए क्या है इसमें सबक?
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़ी सरकारी कंपनियों और खाड़ी देशों के पारंपरिक रास्तों पर निर्भर है। चीन की इस 'टीपॉट' रणनीति ने साबित कर दिया है कि ऊर्जा सुरक्षा के लिए केवल एक रास्ते पर निर्भर रहना खतरनाक हो सकता है। भारत में भी छोटे और स्वतंत्र रिफाइनिंग हब और ऊर्जा भंडारण (Storage) की क्षमता बढ़ाना अब समय की मांग बन गया है।
निष्कर्ष: भू-राजनीति का नया खेल
ईरान-अमेरिका युद्ध ने यह साफ कर दिया है कि भविष्य के युद्ध केवल मिसाइलों से नहीं, बल्कि ऊर्जा की चालाकी से जीते जाएंगे। चीन ने अपनी 'टीपॉट' रिफाइनरियों के जरिए अमेरिका के आर्थिक प्रतिबंधों को लगभग बेअसर कर दिया है, जिससे वह इस महायुद्ध के बीच भी अपनी आर्थिक रफ्तार बनाए रखने में सफल रहा है।