तेहरान: 28 फरवरी 2026 की रात ने मध्य पूर्व के नक्शे को हमेशा के लिए बदल दिया है। इजरायल और अमेरिका के एक समन्वित सैन्य ऑपरेशन में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत ने तेहरान की सत्ता के गलियारों में एक ऐसा शून्य पैदा कर दिया है, जिसे भरने के लिए अब 'संवैधानिक इंजीनियरिंग' का सहारा लिया जा रहा है।
37 वर्षों तक ईरान की राजनीति और धर्म को नियंत्रित करने वाले खामेनेई के जाने के बाद, अब मुल्क को एक 'अंतरिम नेतृत्व परिषद' (Interim Leadership Council) के हवाले कर दिया गया है। यह कोई साधारण सरकारी बदलाव नहीं है, बल्कि यह एक ऐसे इस्लामी गणतंत्र का अस्तित्व बचाने की कवायद है, जो चारों तरफ से युद्ध की आग में घिरा हुआ है।
ईरान का संविधान, जिसे 1979 की क्रांति के बाद रचा गया था, सुप्रीम लीडर की भूमिका को सर्वोच्च मानता है। लेकिन जब पद खाली होता है, तब 'अनुच्छेद 111' सक्रिय हो जाता है। इस अनुच्छेद के अनुसार, एक ऐसी परिषद का गठन किया जाता है जो नए सुप्रीम लीडर के चयन तक देश के कार्यकारी, न्यायिक और धार्मिक फैसलों को नियंत्रित करती है।
वर्तमान में, यह परिषद तीन शक्तिशाली व्यक्तियों का 'सत्ता का त्रिकोण' है: राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन: ईरान की उदारवादी राजनीति का चेहरा।मुख्य न्यायाधीश गोलम-हुसैन मोहसेनी-एजेई: न्यायपालिका के प्रमुख और कट्टरपंथी धड़े के स्तंभ। अयातुल्लाह अलीरेज़ा अराफ़ी: गार्जियन काउंसिल के सदस्य और धार्मिक शिक्षा प्रणाली के सर्वेसर्वा।
यह तिकड़ी न केवल देश की आंतरिक शांति बनाए रखने के लिए जिम्मेदार है, बल्कि इस समय चल रहे इजरायल-अमेरिका के साथ युद्ध को दिशा देने के लिए भी मजबूर है।
मसूद पेज़ेशकियन: पेज़ेशकियन एक हृदय रोग विशेषज्ञ हैं। 2024 में जब वे राष्ट्रपति बने थे, तब से वे लगातार ईरान की डगमगाती अर्थव्यवस्था को ठीक करने और पश्चिमी प्रतिबंधों को कम करने की वकालत करते रहे हैं। हालांकि, उनकी सुधारवादी छवि के बावजूद, उन्हें अब एक ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ रहा है जहाँ 'कूटनीति' से ज्यादा 'युद्ध नीति' की जरूरत है। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि क्या वे रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) के शक्तिशाली कमांडरों का विश्वास जीत पाएंगे?
मोहसेनी-एजेई: मुख्य न्यायाधीश के रूप में एजेई ईरान के उस चेहरे का प्रतिनिधित्व करते हैं जो असहमति को बर्दाश्त नहीं करता। उन्होंने 2021 से अब तक ईरान के कानूनों को और भी सख्त बनाया है। युद्ध के इस दौर में, जब जनता में असंतोष की लहर हो सकती है, एजेई का हाथ ही वो शक्ति है जो 'विद्रोह' को दबाने का काम करेगा।
अयातुल्लाह अलीरेज़ा अराफ़ी: अराफ़ी का महत्व उनके पद से नहीं, बल्कि उनकी धार्मिक पहुंच से है। 'असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स' के उपाध्यक्ष के रूप में, वे तय करेंगे कि अगला सुप्रीम लीडर कौन होगा। चूँकि ईरान एक 'थीओक्रेसी' (धर्मतंत्र) है, अराफ़ी का समर्थन किसी भी नए नेता की वैधता के लिए सबसे जरूरी शर्त है।
इतिहास गवाह है कि जब भी किसी सत्ता के केंद्र (Power Center) का अंत होता है, तो सत्ता संघर्ष शुरू हो जाता है। इस समय ईरान के सामने दो रास्ते हैं:
एकजुटता: देश बाहरी हमले से बचने के लिए इन तीन नेताओं के पीछे लामबंद हो जाए। विघटन: आईआरजीसी (IRGC) और सिविल सरकार के बीच संघर्ष बढ़ जाए। अगर सेना को लगा कि यह 'वॉर काउंसिल' युद्ध जीतने में नाकाम हो रही है, तो वे तख्तापलट करने से नहीं हिचकिचाएंगे।
डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में ईरानी जनता से अपील की है कि वे सरकार के खिलाफ उठ खड़े हों। यह बयान सीधे तौर पर ईरान के मौजूदा सत्ता ढांचे के लिए एक 'एक्सिस्टेंशियल थ्रेट' (अस्तित्व का खतरा) है।
ईरान ने जवाबी हमले में 27 अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया है। इसका मतलब साफ है कि ईरान ने अब 'प्रोक्सी वॉर' को छोड़कर 'डायरेक्ट वॉर' का रास्ता चुन लिया है। होरमुज जलडमरूमध्य, जहाँ से दुनिया का सबसे ज्यादा कच्चा तेल गुजरता है, अब बंद हो चुका है। इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारी भूचाल आना तय है।
भारत, जो ईरान के चाबहार बंदरगाह के माध्यम से मध्य एशिया तक अपनी पहुंच बनाना चाहता था, इस संघर्ष में सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले देशों में से एक है। तेल की बढ़ती कीमतें और शिपिंग रूटों का बाधित होना सीधे तौर पर भारतीय बाजार और आम नागरिक की जेब पर चोट करेगा।
अगले 40 दिन ईरान के लिए 'क्रुशियल' हैं। खामेनेई की मौत के बाद 40 दिनों का शोक रखा गया है। इस दौरान, ईरान को न केवल एक नया सुप्रीम लीडर चुनना है, बल्कि अपनी सीमाओं की रक्षा भी करनी है।
क्या यह तीन-सदस्यीय परिषद इस आग को बुझा पाएगी, या यह ईरान को एक ऐसे 'डार्क एज' (अंधकार युग) में ले जाएगी, जहां से वापसी नामुमकिन है? दुनिया सांस थामे देख रही है। ईरान का यह बदलाव सिर्फ एक देश का नहीं, बल्कि पूरे मध्य पूर्व और वैश्विक कूटनीति के भविष्य का फैसला करेगा।