ईरान इस वक्त अपने इतिहास के सबसे बड़े आंतरिक और बाहरी संकट से गुज़र रहा है। एक तरफ अमेरिका और इजरायल के साथ युद्ध सातवें दिन भी जारी है, तो दूसरी तरफ देश के अंदर सत्ता को लेकर जबरदस्त खींचतान शुरू हो गई है। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान को लेकर देश के राजनीतिक गलियारों और जानकारों के बीच भारी नाराजगी देखी जा रही है। आलोचकों का कहना है कि पेजेश्कियान के पास क्षेत्रीय तनाव को कम करने और जनता के साथ टूटे हुए रिश्तों को सुधारने का एक सुनहरा मौका था, लेकिन वे इसमें पूरी तरह नाकाम रहे हैं। इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयानों ने आग में घी डालने का काम किया है। ट्रंप ने खुलेआम संकेत दिया है कि वे ईरान के नेतृत्व परिवर्तन और भविष्य के ढांचे को प्रभावित करना चाहते हैं, जिससे तेहरान के अंदरूनी हालात और भी पेचीदा हो गए हैं।
ईरान के अंदर चल रहा यह संकट उस समय और गहरा गया जब सांसद मोहसिन ज़ंगानेह ने शुक्रवार को एक बड़ा खुलासा किया। उन्होंने बताया कि 'असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स' के वरिष्ठ धर्मगुरुओं ने अगले सुप्रीम लीडर के पद के लिए दो नाम तय किए थे, लेकिन उन दोनों ही धर्मगुरुओं ने इस जिम्मेदारी को लेने से साफ इनकार कर दिया है। इस डेडलॉक यानी गतिरोध के बीच ईरान की 'एक्सपीडिएंसी डिस्सर्नमेंट काउंसिल' ने एक बड़ा कदम उठाते हुए असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स को सस्पेंड कर दिया है। यह वही संस्था है जो संवैधानिक रूप से सुप्रीम लीडर का चुनाव करती है। अब सत्ता का पूरा नियंत्रण एक प्रोविजनल यानी अंतरिम लीडरशिप स्ट्रक्चर को सौंप दिया गया है।
ईरान के संविधान के अनुच्छेद 111 के तहत इस बदलाव ने राष्ट्रपति पेजेश्कियान को एक बेहद ताकतवर स्थिति में पहुँचा दिया है। प्रोविजनल लीडरशिप काउंसिल के प्रमुख होने के नाते अब पेजेश्कियान के पास सुप्रीम लीडर की कई शक्तियां आ गई हैं, जिसमें सशस्त्र बलों यानी सेना की कमान भी शामिल है। लेकिन विडंबना यह है कि इतनी शक्ति होने के बावजूद पेजेश्कियान बड़े फैसलों में दखल देने से बच रहे हैं। वे राज्य के महत्वपूर्ण मामलों के बजाय मई में होने वाले स्थानीय चुनावों जैसी छोटी चीज़ों की तैयारियों में व्यस्त हैं। पूर्व परिवहन मंत्री अब्बास अखुंडी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पेजेश्कियान की कड़ी आलोचना की है। उन्होंने लिखा है कि आज पेजेश्कियान एक साथ राष्ट्रपति, लीडरशिप काउंसिल के प्रमुख और कमांडर-इन-चीफ हैं, उन्हें मैदान में उतरकर यह ऐलान करना चाहिए कि हर कोई उनके आदेश के नीचे है।
अखुंडी का तर्क है कि उत्तराधिकार की यह बहस इस वक्त पूरी तरह गलत समय पर हो रही है। उनका मानना है कि युद्ध के दौरान ऐसी कोई भी गतिविधि जो ध्यान भटकाती है, वह सीधे तौर पर इजरायल के हाथों में खेलने जैसा है। युद्ध के समय में सत्ता की लड़ाई में उलझना देश के लिए बेहद हानिकारक साबित हो सकता है। लेकिन हकीकत यह है कि ईरान की 'रिवोल्यूशनरी गार्ड्स' यानी आईआरजीसी अब युद्ध के साथ-साथ घरेलू राजनीति के केंद्र में आ गई है। आईआरजीसी क्षेत्रीय टकराव में तो लगी ही है, साथ ही वह उत्तराधिकार की जंग में भी पूरी तरह शामिल है। खबरों के मुताबिक सेना मुजतबा खामेनेई के नाम का पुरजोर समर्थन कर रही है, भले ही इसके लिए संविधान की मर्यादाओं को दरकिनार करना पड़े।
असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स को किनारे किए जाने से ईरान के संस्थानों के बीच की फूट साफ़ दिखने लगी है। कुछ धर्मगुरुओं का तर्क है कि युद्ध के समय उत्तराधिकारी का नाम तय करने से देश के अंदर दरारें और गहरी हो सकती हैं। वहीं दूसरे पक्ष का मानना है कि दुनिया को एकता और नियंत्रण का संदेश देने के लिए जल्द फैसला लेना बहुत ज़रूरी है। एक्सपीडिएंसी काउंसिल ने अंतरिम ढांचे को मंजूरी देकर यह संकेत दे दिया है कि उत्तराधिकार का सवाल अब एक ऐसे आंतरिक विवाद में बदल चुका है जिसमें अब असाधारण हस्तक्षेप की ज़रूरत है। इस पूरी खींचतान के बीच सुरक्षा प्रमुख अली लारीजानी ने भी मोर्चा संभाल लिया है और वे अपने भाई सादिक लारीजानी को सुप्रीम लीडर बनाने की कोशिशों में जुट गए हैं।
सादिक लारीजानी जो कभी न्यायपालिका के प्रमुख थे और अब एक्सपीडिएंसी काउंसिल के अध्यक्ष हैं, वे अपनी ताकत का इस्तेमाल करके आईआरजीसी के प्लान में रोड़ा अटका सकते हैं। वे मुजतबा खामेनेई के रास्ते को धीमा कर सकते हैं जिससे आईआरजीसी की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। फिलहाल ईरान की युद्धकालीन राजनीति पूरी तरह अनिश्चितता के साये में है। मुजतबा खामेनेई, आईआरजीसी के बड़े जनरल और अली लारीजानी जैसे मुख्य खिलाड़ी सार्वजनिक रूप से पूरी तरह चुप हैं, लेकिन पर्दे के पीछे की यह जंग किसी बड़े धमाके की ओर इशारा कर रही है।
पेजेश्कियान के लिए यह समय सबसे बड़ी परीक्षा का है। एक तरफ सीमा पर मिसाइलें बरस रही हैं और दूसरी तरफ तेहरान के सत्ता के गलियारों में साज़िशें रची जा रही हैं। अगर राष्ट्रपति ने अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करके सेना और नेताओं को एक साथ नहीं किया, तो ईरान के लिए यह दोहरा युद्ध जीतना नामुमकिन हो जाएगा। इजरायल और अमेरिका इस अंदरूनी फूट का फायदा उठाने के लिए पूरी तरह तैयार बैठे हैं। डोनाल्ड ट्रंप की नज़रें इसी कमज़ोर कड़ी पर टिकी हैं जहाँ वे ईरान के भविष्य को अपनी शर्तों पर तय करना चाहते हैं।
ईरान की जनता जो पहले से ही महंगाई और युद्ध के डर में जी रही है, अब अपने नेतृत्व की इस लड़ाई को देख कर और भी डरी हुई है। उन्हें एक मज़बूत नेता की ज़रूरत है जो उन्हें इस संकट से बाहर निकाल सके, लेकिन पेजेश्कियान की चुप्पी ने उन्हें निराश किया है। आने वाले दिनों में अगर उत्तराधिकार का मामला हल नहीं हुआ, तो ईरान के अंदर एक गृह युद्ध जैसी स्थिति भी पैदा हो सकती है, जिसका सीधा असर मिडिल ईस्ट के पूरे युद्ध पर पड़ेगा। सेना और धर्मगुरुओं के बीच का यह टकराव अब ईरान के अस्तित्व की लड़ाई बन गया है।
रिवोल्यूशनरी गार्ड्स अपनी पकड़ को ढीला नहीं होने देना चाहती। वे जानते हैं कि अगर मुजतबा खामेनेई को गद्दी नहीं मिली, तो भविष्य में सेना का राजनीतिक रसूख कम हो सकता है। वहीं सादिक लारीजानी जैसे पुराने नेता अपनी विरासत को बचाने के लिए हाथ-पैर मार रहे हैं। यह सत्ता का वह खेल है जिसमें प्यादे आम नागरिक बन रहे हैं और बाज़ी जीतने के लिए अंतरराष्ट्रीय ताकतों का सहारा लिया जा रहा है। तेहरान की सड़कों पर सन्नाटा है लेकिन हुकूमत के महलों में मचे इस शोर ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है।
निष्कर्ष यह है कि ईरान इस वक्त बिना किसी एक मज़बूत दिशा के आगे बढ़ रहा है। कमांडर-इन-चीफ होने के नाते पेजेश्कियान को वह साहस दिखाना होगा जो एक युद्धकालीन राष्ट्रपति से अपेक्षित है। अगर वे ऐसा नहीं कर पाते हैं, तो ईरान की संवैधानिक व्यवस्था पूरी तरह ढह सकती है। मई में होने वाले चुनावों की तैयारी करना इस वक्त जलते हुए घर में पेंट करने जैसा है। अब देखना यह है कि क्या ईरानी तंत्र इस अंदरूनी गतिरोध को तोड़ पाता है या फिर सत्ता की यह भूख उन्हें बाहरी दुश्मनों के सामने और भी कमज़ोर बना देगी।