काठमांडू : उत्तर प्रदेश और बिहार की सीमाओं से सटे हमारे पड़ोसी देश नेपाल में चुनावी शोर थमने को है। मतदान से ठीक पहले, प्रचार के आखिरी दिन सत्ता पक्ष और विपक्ष ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। UttarWorld की विशेष रिपोर्ट के अनुसार, नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल 'प्रचंड' ने देश की जनता से लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए भारी संख्या में मतदान करने की अपील की है।
सोमवार को काठमांडू की सड़कों पर हुजूम उमड़ पड़ा। एक तरफ पीएम 'प्रचंड' की माओवादी पार्टी और नेपाली कांग्रेस का गठबंधन था, तो दूसरी तरफ पूर्व पीएम केपी शर्मा ओली की CPN-UML पार्टी। दोनों ही गुटों ने हजारों समर्थकों के साथ शक्ति प्रदर्शन किया और भ्रष्टाचार मुक्त नेपाल का वादा किया।
प्रचार थमने से पहले प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम संबोधन में कहा— "यह चुनाव केवल प्रतिनिधियों को चुनने के लिए नहीं, बल्कि नेपाल के संघीय गणराज्य की रक्षा के लिए है।" उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे देश में स्थिरता लाने के लिए बढ़-चढ़कर वोट दें।
नेपाल के चुनावों में हमेशा की तरह भारत और चीन के साथ रिश्तों पर बहस छिड़ी हुई है। मतदान के मद्देनजर भारत-नेपाल सीमा पर सुरक्षा बढ़ा दी गई है। अगले 48 घंटों के लिए सीमावर्ती नाकों पर आवाजाही पर कड़ी नजर रखी जा रही है ताकि शांतिपूर्वक चुनाव संपन्न हो सकें। नेपाल की जनता इस बार विकास के वादों से ज्यादा 'रोजी-रोटी' के मुद्दों पर केंद्रित है। खाड़ी देशों में पलायन कर रहे युवाओं को देश में ही रोकने और आसमान छूती महंगाई इस चुनाव के सबसे बड़े एजेंडे बनकर उभरे हैं।
प्रचार खत्म होते ही नेपाल में 'साइलेंस पीरियड' लागू हो गया है। अब कोई भी राजनीतिक दल प्रचार या रैलियां नहीं कर सकेगा। सुरक्षा के लिए सेना और पुलिस की टुकड़ियों को संवेदनशील मतदान केंद्रों पर तैनात कर दिया गया है।
नेपाल की राजनीति में अस्थिरता एक पुरानी समस्या रही है। क्या इस बार कोई पार्टी स्पष्ट बहुमत पाएगी या फिर एक बार 'गठबंधन की खिचड़ी' पकेगी? नेपाल में होने वाला सत्ता परिवर्तन भारत के लिए सुरक्षा और कूटनीति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है, खासकर राम मंदिर (अयोध्या) के करीब होने के कारण सांस्कृतिक रिश्तों पर इसका बड़ा असर पड़ता है।