येरुशलम: PM नरेंद्र मोदी ने अपनी इजरायल यात्रा के पहले दिन एक ऐतिहासिक मील का पत्थर स्थापित करते हुए वहां की संसद, 'नेसेट' (Knesset), को संबोधित किया। प्रधानमंत्री का यह संबोधन न केवल दोनों देशों के बीच प्रगाढ़ होते कूटनीतिक संबंधों का प्रमाण है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय पटल पर भारत की बढ़ती शक्ति को भी प्रदर्शित करता है। सदन में प्रधानमंत्री का स्वागत बेहद गर्मजोशी के साथ किया गया, जो दोनों लोकतंत्रों के बीच आपसी सम्मान और गहरी मित्रता को दर्शाता है।
अपने संबोधन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने आतंकवाद को वैश्विक शांति के लिए सबसे गंभीर खतरा बताया। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि भारत और इजरायल दोनों ही लंबे समय से आतंकवाद का दंश झेल रहे हैं। प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा कि अब समय आ गया है कि दुनिया की सभी लोकतांत्रिक शक्तियां इस मानवता विरोधी खतरे के खिलाफ एक मंच पर आएं। उन्होंने बिना किसी देश का नाम लिए उन ताकतों को चेतावनी दी जो आतंकवाद को संरक्षण देती हैं, और सुरक्षा के क्षेत्र में इजरायल के साथ अटूट सहयोग की प्रतिबद्धता दोहराई।
प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में रक्षा, कृषि और जल संरक्षण जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में द्विपक्षीय सहयोग को विस्तार देने पर विशेष बल दिया। उन्होंने इजरायल को भारत का एक 'स्वाभाविक सहयोगी' बताते हुए कहा कि इजरायल का नवाचार (Innovation) और भारत की विशाल कार्यक्षमता (Scale) मिलकर दुनिया में बड़े बदलाव ला सकते हैं। विशेष रूप से सेमीकंडक्टर निर्माण और अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में दोनों देशों की भविष्य की योजनाओं का जिक्र करते हुए उन्होंने एक नए आर्थिक रोडमैप की रूपरेखा प्रस्तुत की।
संबोधन के अंतिम चरण में प्रधानमंत्री ने भारत में रहने वाले यहूदी समुदाय के योगदान की सराहना की और उन्हें दोनों देशों के बीच एक जीवंत कड़ी बताया। उन्होंने विश्वास जताया कि यह यात्रा केवल व्यापारिक और रणनीतिक समझौता नहीं है, बल्कि दो प्राचीन सभ्यताओं के पुनर्मिलन का प्रतीक है। प्रधानमंत्री ने भविष्य की चुनौतियों का समाधान मिलकर करने का संकल्प लिया और कहा कि भारत-इजरायल की यह साझेदारी आने वाले समय में वैश्विक स्थिरता और प्रगति का मुख्य आधार बनेगी।