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कानपुर का औद्योगिक ब्लैकआउट: LPG की भारी किल्लत से 1250 फैक्ट्रियां बंद, 50 हजार परिवारों के चूल्हे ठंडे होने की कगार पर

By Uttar World Desk

03 अप्र, 2026 | 03:48 बजे
कानपुर का औद्योगिक ब्लैकआउट: LPG की भारी किल्लत से 1250 फैक्ट्रियां बंद, 50 हजार परिवारों के चूल्हे ठंडे होने की कगार पर

कानपुर, 03 अप्रैल (उत्तर वर्ल्ड डेस्क): उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े औद्योगिक केंद्र कानपुर में आज सन्नाटा पसरा हुआ है। कभी चौबीसों घंटे मशीनों की गड़गड़ाहट से गूंजने वाले दादा नगर, पनकी और जाजमऊ जैसे इलाके अब किसी वीरान टापू की तरह नजर आ रहे हैं। ईरान और अमेरिका के बीच खाड़ी क्षेत्र में छिड़े भीषण युद्ध (Iran-US War) की तपिश अब कानपुर की भट्टियों तक पहुँच गई है। एलपीजी (LPG) की भारी कमी और इसकी कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी के कारण जिले की 1250 छोटी-बड़ी औद्योगिक इकाइयों ने अपने उत्पादन पर पूरी तरह से रोक लगा दी है।

ग्राउंड जीरो का हाल: भट्टियां ठंडी, मजदूर बेहाल

'आज तक' की ग्राउंड रिपोर्ट के मुताबिक, कानपुर के औद्योगिक क्षेत्रों में स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। एलपीजी सप्लाई चेन पूरी तरह से ध्वस्त होने के कारण भट्टियों को जरूरी ईंधन नहीं मिल पा रहा है।

  • सन्नाटा: फजलगंज और दादा नगर की गलियों में जहां कभी हजारों मजदूर काम करते थे, वहां अब केवल फैक्ट्रियों के बंद गेट और उन पर लटके ताले नजर आ रहे हैं।

  • मजदूरों का दर्द: इन 1250 फैक्ट्रियों के बंद होने से सीधे तौर पर 50,000 से अधिक दिहाड़ी मजदूर प्रभावित हुए हैं। काम बंद होने के कारण उनकी दिहाड़ी रुक गई है, जिससे हजारों परिवारों के सामने अगले कुछ दिनों में भूखों मरने की नौबत आ सकती है।

  • मालकों की बेबसी: फैक्ट्री मालिकों का कहना है कि गैस की कीमतें पिछले 15 दिनों में 50% से अधिक बढ़ गई हैं। इस महंगी दर पर उत्पादन करना संभव नहीं है, क्योंकि बाजार में तैयार माल की इतनी कीमत नहीं मिल रही है।

क्यों पैदा हुआ यह अभूतपूर्व संकट?

विशेषज्ञों के अनुसार, कानपुर का यह संकट सीधे तौर पर 'स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज' (Strait of Hormuz) की नाकेबंदी से जुड़ा है। भारत अपनी औद्योगिक और घरेलू एलपीजी जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है। ईरान-अमेरिका युद्ध के कारण समुद्री मार्ग असुरक्षित हो गए हैं, जिससे गैस लेकर आने वाले टैंकर या तो रास्ते में फंसे हैं या उन्हें वापस भेज दिया गया है।

सप्लाई कम होने से घरेलू गैस की कालाबाजारी भी शुरू हो गई है, जिसका सीधा असर कानपुर के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) पर पड़ा है। ये इकाइयां तेल और कोयले के बजाय एलपीजी पर अधिक निर्भर थीं, जो अब उनकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई है।

करोड़ों का निर्यात और आर्थिक चोट

कानपुर न केवल यूपी बल्कि देश के लिए लेदर, टेक्सटाइल और मेटल गुड्स का बड़ा हब है। फैक्ट्रियां बंद होने से:

  1. कैंसिल होते ऑर्डर: यूरोप और अमेरिका से आए करोड़ों रुपये के एक्सपोर्ट ऑर्डर समय पर पूरे नहीं हो पा रहे हैं, जिससे खरीदार अब अन्य देशों (जैसे वियतनाम या बांग्लादेश) की ओर रुख कर रहे हैं।

  2. राजस्व का नुकसान: राज्य और केंद्र सरकार को मिलने वाले जीएसटी (GST) और अन्य करों में करोड़ों रुपये की गिरावट आने की आशंका है।

  3. सप्लाई चेन ब्रेक: कानपुर की इन फैक्ट्रियों से जुड़ा कच्चा माल सप्लाई करने वाले छोटे व्यापारी और ट्रांसपोर्टर भी अब काम न होने के कारण बर्बादी की कगार पर हैं।

कानपुर के उद्यमियों की सरकार से मांग

'इंडियन इंडस्ट्रीज एसोसिएशन' (IIA) और 'कानपुर चैंबर ऑफ कॉमर्स' ने इस स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उद्यमियों ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय को पत्र लिखकर मांग की है कि:

  • औद्योगिक इकाइयों को एलपीजी की निर्बाध सप्लाई सुनिश्चित की जाए।

  • गैस की कीमतों पर अस्थाई सब्सिडी दी जाए ताकि फैक्ट्रियां दोबारा चालू हो सकें।

  • मजदूरों के लिए विशेष आर्थिक सहायता पैकेज की घोषणा की जाए।

निष्कर्ष: आगे का रास्ता चुनौतीपूर्ण

35 दिनों से जारी ईरान-अमेरिका युद्ध ने यह साबित कर दिया है कि वैश्विक स्तर पर होने वाली कोई भी हलचल कानपुर की गलियों तक असर डालती है। यदि युद्ध और लंबा खिंचता है, तो कानपुर का यह 'ब्लैकआउट' पूरे उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था को पटरी से उतार सकता है। प्रशासन और उद्योग जगत को अब मिलकर वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर विचार करना होगा, ताकि भविष्य में इस तरह के संकट से बचा जा सके।

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