लखनऊ: उत्तर प्रदेश की सियासत में 2027 के विधानसभा चुनाव की बिसात बिछनी शुरू हो गई है। समाजवादी पार्टी (SP) ने 15 मार्च को बसपा संस्थापक मान्यवर कांशीराम की जयंती को 'पीडीए दिवस' (Bahujan Samaj Diwas) के रूप में बड़े पैमाने पर मनाने का ऐलान किया है। इस घोषणा के बाद से ही बसपा सुप्रीमो मायावती ने तीखी प्रतिक्रिया दी है।
सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस साल 15 मार्च को प्रदेश के सभी जिला मुख्यालयों पर कार्यक्रम आयोजित करने का निर्देश दिया है। सपा का तर्क है कि: पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का एजेंडा वही है जो कांशीराम का था—यानी 'बहुजन समाज' का सशक्तिकरण। 2024 के लोकसभा चुनावों में पीडीए फॉर्मूले की सफलता के बाद, अखिलेश इसे 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए अपना मुख्य हथियार मान रहे हैं। पार्टी इसके माध्यम से दलित वोटबैंक को सीधे अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है।
मायावती का पलटवार: 'यह केवल राजनीतिक ड्रामा है'
बसपा प्रमुख मायावती ने इस कदम को "शुद्ध राजनीतिक ड्रामा" करार दिया है। उन्होंने अपने सोशल मीडिया (X) पर तीखा हमला करते हुए कहा: मायावती ने 1993 के गठबंधन और 1995 के 'गेस्ट हाउस कांड' का जिक्र करते हुए कहा कि सपा का चरित्र हमेशा से दलित-विरोधी रहा है। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे सपा सरकारों ने कांशीराम के नाम पर रखे गए जिलों (जैसे कांशीराम नगर, संत रविदास नगर) और संस्थानों के नाम बदल दिए थे। उन्होंने अपने समर्थकों से सतर्क रहने की अपील की और कहा कि सपा केवल वोट बैंक की राजनीति के लिए महापुरुषों का इस्तेमाल कर रही है।
सियासी मायने: लड़ाई विरासत की है
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि: सपा जानती है कि दलित वोट बैंक में सेंध लगाए बिना यूपी में सत्ता की वापसी मुश्किल है। बसपा अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए संघर्ष कर रही है, और किसी भी अन्य पार्टी को कांशीराम की विरासत पर दावा करने देना उसके लिए अस्तित्व का संकट है। बीजेपी इस पूरे विवाद को दूर से देख रही है, क्योंकि सपा और बसपा का आपस में टकराना अंततः उसके लिए फायदेमंद हो सकता है।