किशनगंज: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का तीन दिवसीय बिहार दौरा राजनीतिक और रणनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। नेपाल और बांग्लादेश की सीमाओं से सटे सीमांचल क्षेत्र में शाह की मौजूदगी केवल सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लेने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पश्चिम बंगाल और बिहार की आगामी चुनावी रणनीति का एक बड़ा संकेत है।
दौरे की रणनीतिक अहमियत:
शाह किशनगंज, अररिया, पूर्णिया और कटिहार सहित सात जिलों के डीएम (DM) और एसपी (SP) के साथ सुरक्षा की स्थिति पर विस्तृत बैठक कर रहे हैं। इस इलाके में अवैध घुसपैठ, फर्जी पहचान पत्रों का नेटवर्क, और तस्करी के रास्तों को लेकर खुफिया एजेंसियों ने लंबे समय से चेतावनी दी है।सीमांचल के कुछ इलाकों में आबादी का असामान्य और तेजी से बढ़ना सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता का विषय है, जिसे भाजपा अक्सर घुसपैठ का परिणाम बताती है।
बंगाल चुनाव पर नजर:
अमित शाह का यह दौरा यह संदेश देने की कोशिश है कि घुसपैठ का मुद्दा सिर्फ पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे पूर्वी भारत (असम, बिहार, त्रिपुरा) की राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है। केंद्र सरकार 'स्पेशल इंटेंसिव रिविजन' (SIR) के माध्यम से मतदाता सूची की शुद्धता पर जोर दे रही है, जिसे टीएमसी (TMC) ने 'NRC का नया नाम' बताकर विरोध किया है।
'चिकन नेक' की सुरक्षा और राष्ट्रीय एजेंडा:
सीमांचल का क्षेत्र 'चिकन नेक' (सिलिगुड़ी कॉरिडोर) के बेहद करीब है, जो पूर्वोत्तर भारत को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ता है। यहाँ की सुरक्षा में छोटी सी भी चूक राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन सकती है। शाह इस दौरे से एक साथ दो नैरेटिव तैयार कर रहे हैं: बिहार और केंद्र की सुरक्षा नीतियों को और मजबूत करना। बंगाल चुनाव में घुसपैठ के मुद्दे को एक बड़ा चुनावी विमर्श बनाना।