नई दिल्ली: भारत की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) ने एक ऐतिहासिक और कड़ा रुख अपनाते हुए NCERT की 8वीं कक्षा की पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका (Judiciary) के खिलाफ अपमानजनक सामग्री पर खुद संज्ञान (Suo Motu) लिया है। कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए कहा कि स्कूली बच्चों को यह पढ़ाना कि देश की न्यायपालिका 'भ्रष्ट' है, न केवल गलत है बल्कि यह आने वाली पीढ़ी के मन में संवैधानिक संस्थाओं के प्रति नफरत और अविश्वास के बीज बोने जैसा है।
विवाद की जड़ NCERT की 8वीं कक्षा की सामाजिक विज्ञान (Civics/Social Science) की किताब का एक विशेष अध्याय है। इस चैप्टर में देश की कानूनी प्रणाली और न्यायपालिका की कार्यप्रणाली को समझाया गया है। आरोप है कि इस चैप्टर के कुछ पैराग्राफ और उदाहरणों में न्यायपालिका को एक ऐसी संस्था के रूप में चित्रित किया गया है जहाँ भ्रष्टाचार व्याप्त है और जहाँ आम आदमी को न्याय मिलना लगभग असंभव है।
सुप्रीम कोर्ट के ध्यान में जब यह बात लाई गई, तो जजों की बेंच ने इस पर गहरी नाराजगी व्यक्त की। कोर्ट ने कहा कि आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन बिना किसी ठोस आधार के स्कूली बच्चों की किताबों में पूरी न्यायपालिका को 'भ्रष्ट' बता देना शिक्षा के उद्देश्यों के खिलाफ है।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कई बड़े सवाल खड़े किए:
संस्था की गरिमा: कोर्ट ने कहा, "न्यायपालिका लोकतंत्र का तीसरा स्तंभ है। अगर 13-14 साल के बच्चों के मन में यह डाल दिया जाएगा कि उनके देश की अदालतें बिकाऊ या भ्रष्ट हैं, तो भविष्य में वे कानून का सम्मान कैसे करेंगे?"
NCERT की जिम्मेदारी: कोर्ट ने सवाल किया कि आखिर किस एक्सपर्ट कमेटी ने इस कंटेंट को मंजूरी दी? क्या तथ्यों की जांच की गई थी या यह सिर्फ एक एजेंडे के तहत लिखा गया?
गलत जानकारी का प्रसार: बेंच ने टिप्पणी की कि किताबों में सुधार की जरूरत है, न कि संस्थाओं को बदनाम करने की।
न्यायपालिका बनाम NCERT: इतिहास में पहली बार ऐसी सख्ती
यह पहली बार नहीं है जब NCERT की किताबों पर विवाद हुआ हो, लेकिन यह शायद पहली बार है जब देश की सबसे बड़ी अदालत ने खुद आगे बढ़कर एक चैप्टर पर रोक लगाने या उसमें सुधार करने के लिए सुओ मोटो एक्शन लिया है। इससे पहले अक्सर इतिहास के तथ्यों या मुगल काल के चैप्टर हटाने पर विवाद होता था, लेकिन इस बार मामला न्यायपालिका की अपनी छवि और साख का है।
शिक्षा जगत में मची खलबली
सुप्रीम कोर्ट के इस कड़े रुख के बाद शिक्षा मंत्रालय और NCERT के गलियारों में हड़कंप मच गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूली शिक्षा में 'क्रिटिकल थिंकिंग' (Critical Thinking) जरूरी है, यानी बच्चों को व्यवस्था की कमियां बताई जानी चाहिए, लेकिन 'जनरलाइजेशन' (Generalization) यानी सबको एक ही तराजू में तौलना गलत है।
शिक्षाविदों का एक वर्ग यह भी कह रहा है कि अदालतों में पेंडिंग केस और कुछ निचले स्तर के भ्रष्टाचार की चर्चा करना अलग बात है, लेकिन किताब की भाषा ऐसी होनी चाहिए जो सुधार की गुंजाइश दिखाए, न कि व्यवस्था से भरोसा ही उठा दे।
कानूनी विशेषज्ञों की राय
वरिष्ठ वकीलों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह कदम संविधान के अनुच्छेद 129 और 142 के तहत मिली शक्तियों का प्रयोग है। कोर्ट अपनी अवमानना (Contempt) को लेकर बहुत संवेदनशील है। अगर किसी किताब से न्यायपालिका की छवि खराब होती है, तो कोर्ट के पास उसे हटाने या प्रतिबंधित करने का पूरा अधिकार है।
अब आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और NCERT के डायरेक्टर को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। मुमकिन है कि कोर्ट एक स्वतंत्र विशेषज्ञों की कमेटी बनाए जो पूरी किताब की समीक्षा करे। अगली सुनवाई तक NCERT को विवादित पैराग्राफ हटाने या उन्हें संशोधित करने का आदेश दिया जा सकता है। NCERT की वेबसाइट पर मौजूद ई-बुक्स से इस कंटेंट को तुरंत हटाने की प्रक्रिया शुरू हो सकती है।
निष्कर्ष
NCERT की किताबों का देश भर के करोड़ों छात्र अध्ययन करते हैं। यह मामला सिर्फ एक चैप्टर का नहीं है, बल्कि यह सवाल है कि हम अपनी अगली पीढ़ी को देश के लोकतंत्र के बारे में क्या नजरिया दे रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट का दखल यह सुनिश्चित करेगा कि शिक्षा का माध्यम सूचना देने के लिए हो, न कि भ्रम फैलाने या संस्थाओं को कमजोर करने के लिए।