शुक्रवार, 27 मार्च 2026
प्रयागराज

इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 'सत्य जानने का अधिकार सबको है', पिता-पुत्री विवाद में DNA टेस्ट का आदेश

By Uttar World Desk

26 मा, 2026 | 09:34 बजे
इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 'सत्य जानने का अधिकार सबको है', पिता-पुत्री विवाद में DNA टेस्ट का आदेश

प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पारिवारिक विवादों और भरण-पोषण (Maintenance) से जुड़े मामलों में एक नजीर पेश करने वाला फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जब बात पितृत्व (Paternity) पर आकर टिक जाए, तो सत्य को सामने लाना अनिवार्य है। एक पिता और पुत्री के बीच चल रहे भरण-पोषण के विवाद की सुनवाई करते हुए माननीय उच्च न्यायालय ने डीएनए (DNA) टेस्ट कराने का आदेश जारी किया है। कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि पिता और पुत्री, दोनों को ही सच्चाई जानने का कानूनी और नैतिक अधिकार है।

क्या है पूरा विवाद? (Case Background)

यह मामला एक पिता द्वारा अपनी कथित पुत्री को भरण-पोषण देने से इनकार करने के बाद शुरू हुआ। पिता का दावा था कि जिस लड़की ने कोर्ट में गुजारा भत्ता की मांग की है, वह उसकी सगी संतान नहीं है। निचली अदालत (Family Court) ने पहले इस मामले में पिता की दलीलों को दरकिनार करते हुए अंतरिम राहत के आदेश दिए थे।

इसके बाद, पिता ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और मांग की कि यदि विज्ञान के पास सच्चाई का पता लगाने का रास्ता है, तो उसका उपयोग किया जाना चाहिए। पिता ने अपनी याचिका में साक्ष्यों के साथ यह चुनौती दी कि वह इस बच्ची का जैविक पिता (Biological Father) नहीं है, इसलिए वह कानूनन भरण-पोषण देने के लिए बाध्य नहीं है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी

मामले की गंभीरता को देखते हुए जस्टिस की पीठ ने कहा कि आधुनिक न्यायशास्त्र में वैज्ञानिक साक्ष्यों की अपनी एक विशेष जगह है। कोर्ट ने कहा, "सत्य एक ऐसी वस्तु है जिससे किसी को वंचित नहीं रखा जा सकता। यदि एक पक्ष पितृत्व को चुनौती दे रहा है और दूसरा पक्ष उसे अपना अधिकार बता रहा है, तो DNA टेस्ट ही वह एकमात्र वैज्ञानिक जरिया है जो इस विवाद को हमेशा के लिए शांत कर सकता है।"

कोर्ट ने यह भी कहा कि पितृत्व का निर्धारण न केवल आर्थिक अधिकारों (भरण-पोषण) के लिए जरूरी है, बल्कि यह उस बच्ची की पहचान और सामाजिक स्थिति के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। सत्य सामने आने से भविष्य में होने वाली कानूनी पेचीदगियों से बचा जा सकेगा।

कानूनी प्रक्रिया और DNA टेस्ट का महत्व

आमतौर पर अदालतें DNA टेस्ट का आदेश देने में काफी सावधानी बरतती हैं ताकि किसी की गोपनीयता (Privacy) का उल्लंघन न हो, लेकिन इस मामले में कोर्ट ने माना कि न्याय के हित में यह कदम उठाना अनिवार्य है। कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया है कि निर्धारित प्रक्रिया के तहत सैंपल लिए जाएं और एक प्रतिष्ठित फॉरेंसिक लैब से इसकी जांच कराई जाए।

इस फैसले का असर अब उत्तर प्रदेश के कई अन्य पारिवारिक विवादों पर भी पड़ सकता है, जहाँ अक्सर बच्चे के पितृत्व को लेकर सवाल उठाए जाते हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदेश उन लोगों के लिए एक बड़ी राहत है जो गलत तरीके से कानूनी मुकदमों में फंसाए जाते हैं, साथ ही यह उन बच्चों के अधिकारों की भी रक्षा करेगा जिन्हें उनके पिता स्वीकार करने से मना कर देते हैं।

भविष्य की राह और निष्कर्ष

अब इस मामले की अगली सुनवाई DNA रिपोर्ट आने के बाद होगी। रिपोर्ट के आधार पर ही तय होगा कि पिता को भरण-पोषण देना होगा या नहीं। इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि कानून की नज़र में 'सत्य' सर्वोपरि है और तकनीक का इस्तेमाल न्याय प्रक्रिया को सुगम बनाने के लिए किया जाना चाहिए।

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