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टेक्नोलॉजी

AI कम्पनियाँ चुनावों को प्रभावित करने के लिए जुटाया करोड़ों का फंड, जानिए क्या है ये Super PAC और इसका दुनिया पर असर

By Uttar World Desk

30 जन, 2026 | 08:40 बजे
AI कम्पनियाँ चुनावों को प्रभावित करने के लिए जुटाया करोड़ों का फंड, जानिए क्या है ये Super PAC और इसका दुनिया पर असर

आने वाले चुनावों में Artificial Intelligence (AI) की भूमिका को लेकर अमेरिका में बड़ी हलचल शुरू हो गई है। दुनिया की दिग्गज AI कंपनियों ने मिलकर एक 'Super PAC' (पॉलिटिकल एक्शन कमेटी) बनाई है, जिसने चुनाव प्रचार के लिए भारी-भरकम फंड जुटाना शुरू कर दिया है।


आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की दुनिया अब केवल चैटबॉट्स और रोबोट्स तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने राजनीति के अखाड़े में भी कदम रख दिया है। साल 2026 के चुनावी सरगर्मियों के बीच, अमेरिका की दिग्गज AI कंपनियों और निवेशकों ने मिलकर एक विशाल 'Super PAC' (पॉलिटिकल एक्शन कमेटी) का गठन किया है। इस कमेटी ने रिकॉर्ड तोड़ चुनावी चंदा जुटाया है, जिससे पूरी दुनिया की राजनीति में हलचल मच गई है।

ताज़ा रिपोर्टों के अनुसार, इस Super PAC ने कुछ ही समय में करोड़ों डॉलर का फंड इकट्ठा कर लिया है। इस पैसे का मुख्य उद्देश्य उन उम्मीदवारों का समर्थन करना है जो AI इंडस्ट्री के पक्ष में कानून बनाने का वादा करते हैं। टेक एक्सपर्ट्स का मानना है कि कंपनियां अब सीधे तौर पर सत्ता को प्रभावित करना चाहती हैं ताकि भविष्य में AI पर लगने वाले कड़े प्रतिबंधों से बचा जा सके। यह पहली बार है जब सिलिकॉन वैली की ताकत इस तरह से संगठित होकर चुनाव प्रचार में उतर रही है।

इस कदम के पीछे सबसे बड़ी वजह AI से जुड़े नियम (Regulations) हैं। जैसे-जैसे AI तकनीक एडवांस हो रही है, दुनिया भर की सरकारें इस पर नकेल कसने की तैयारी कर रही हैं। कंपनियां चाहती हैं कि सरकारें ऐसी नीतियां बनाएं जिससे इनोवेशन न रुके। यह Super PAC उन नेताओं को विज्ञापन और कैंपेन के जरिए मदद पहुंचाएगा जो तकनीकी विकास के समर्थक हैं। हालांकि, आलोचकों का कहना है कि यह 'पैसे के दम पर लोकतंत्र को खरीदने' जैसी कोशिश हो सकती है।

राजनीतिक विशेषज्ञों ने इस भारी-भरकम फंडिंग पर चिंता भी जताई है। उनका मानना है कि इस चंदे का इस्तेमाल चुनाव के दौरान विज्ञापनों में AI जनित कंटेंट और डीपफेक (Deepfake) को बढ़ावा देने के लिए किया जा सकता है। इससे वोटरों को भ्रमित करने का खतरा बढ़ जाता है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह 'डिजिटल चंदा' चुनाव के परिणामों को किस दिशा में मोड़ता है।

कुल मिलाकर, AI अब सिर्फ एक तकनीकी टूल नहीं बल्कि एक राजनीतिक हथियार बन चुका है। भारत जैसे देशों के लिए भी यह एक बड़ा संकेत है कि आने वाले समय में यहाँ की राजनीति में भी तकनीकी कंपनियों का दखल बढ़ सकता है।

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