नई दिल्ली/बेंगलुरु। विज्ञान की दुनिया में आज वो चमत्कार हो गया है जिसे कल तक हम सिर्फ हॉलीवुड फिल्मों में देखते थे। एलन मस्क की कंपनी Neuralink ने भारत के एक प्रमुख न्यूरोलॉजिकल संस्थान के साथ मिलकर पहले 'ह्यूमन-कंप्यूटर इंटरफेस' का सफल ट्रायल पूरा कर लिया है। इस तकनीक के बाद अब आपको फोन चलाने के लिए हाथों की जरूरत नहीं होगी, आपका दिमाग सीधे इंटरनेट से 'सिंक' हो सकेगा।
क्या है यह 'जादुई' तकनीक?
इस ट्रायल के तहत एक सिक्का नुमा चिप (Link) को इंसान के दिमाग के उस हिस्से में इम्प्लांट किया गया है जो मूवमेंट को कंट्रोल करता है।
विचारों से कंट्रोल: अब यूजर सिर्फ 'सोचकर' कंप्यूटर का कर्सर हिला सकता है, गाने बदल सकता है और बिना टाइप किए मैसेज भेज सकता है।
याददाश्त होगी 'क्लाउड' पर: मस्क का दावा है कि भविष्य में इस चिप के जरिए इंसान अपनी यादों को डिजिटल रूप में सेव कर सकेगा और जरूरत पड़ने पर उन्हें दोबारा 'डाउनलोड' कर पाएगा।
भारत के लिए क्यों है यह बड़ी खबर?
बेंगलुरु के एक 28 वर्षीय युवक, जो एक दुर्घटना के कारण लकवाग्रस्त (Paralyzed) था, इस ट्रायल का हिस्सा बना। सर्जरी के महज 48 घंटे बाद उसने अपने दिमाग की लहरों (Brain Waves) के जरिए शतरंज का गेम खेला। यह न केवल मेडिकल साइंस बल्कि भारतीय टेक-इंडस्ट्री के लिए भी एक नया सवेरा है।
प्राइवेसी पर उठे सवाल: क्या हैकिंग का खतरा है?
जैसे ही यह खबर वायरल हुई, सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर दिमाग इंटरनेट से जुड़ गया, तो क्या कोई हमारे विचारों को 'हैक' कर सकता है? क्या कंपनियां हमारे दिमाग में सीधे विज्ञापन (Ads) भेज पाएंगी? इन सवालों ने पूरी दुनिया में हलचल मचा दी है।