इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक आपराधिक मामले की सुनवाई के दौरान कानून के 'दुर्भावना के हस्तांतरण के सिद्धांत' (Doctrine of Transfer of Malice) को रेखांकित करते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई व्यक्ति किसी की हत्या के इरादे से गोली चलाता है और वह निशाना चूककर किसी निर्दोष व्यक्ति को लग जाती है, जिससे उसकी मौत हो जाए, तो इसे गैर-इरादतन हत्या नहीं बल्कि 'मर्डर' ही माना जाएगा। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा और न्यायमूर्ति जयकृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने संभल के एक अपराधी रिजवान की जमानत और सजा स्थगन की याचिका को खारिज करते हुए यह आदेश दिया।
यह मामला वर्ष 2019 का है, जब रिजवान ने संभल के बनियाढेर इलाके में एक दुकानदार से विवाद के बाद उसे मारने के इरादे से गोली चलाई थी। निशाना चूकने पर दूसरी गोली वहां काम कर रहे शाकिर नाम के मजदूर को लग गई, जिसकी बाद में मौत हो गई। निचली अदालत ने उसे दोषी करार दिया था, जिसके खिलाफ वह हाईकोर्ट पहुंचा था। अभियुक्त के वकील का तर्क था कि चूंकि शाकिर को मारने का कोई इरादा नहीं था, इसलिए इसे धारा 302 के बजाय हल्की धाराओं में रखा जाए। हालांकि, अदालत ने सरकारी वकील द्वारा पेश किए गए रिजवान के 27 आपराधिक मामलों के इतिहास और अपराध की प्रकृति को देखते हुए उसे कोई भी राहत देने से साफ इनकार कर दिया। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि हत्या का इरादा (Animus) व्यक्ति विशेष के बजाय कृत्य की गंभीरता पर आधारित होता है।