उत्तर वर्ल्ड की विशेष रिपोर्ट के अनुसार, ब्रह्मांड के रहस्यों को सुलझाने की दिशा में वैज्ञानिकों को एक ऐसी सफलता मिली है जो मंगल ग्रह के प्रति हमारा नज़रिया हमेशा के लिए बदल सकती है। लंबे समय से यह बहस का विषय रहा है कि क्या लाल ग्रह पर कभी पानी का विशाल भंडार मौजूद था, लेकिन अब नासा के एक दशक पुराने डेटा के विश्लेषण ने इस पर मुहर लगा दी है। टेक्सास विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने मंगल ग्रह के उत्तरी मैदानों में एक ऐसी संरचना की पहचान की है जो बिल्कुल पृथ्वी के समुद्री किनारों या कॉन्टिनेंटल शेल्फ जैसी दिखाई देती है। शोधकर्ताओं ने इसे एक विशाल 'बाथटब रिंग' की संज्ञा दी है, जो यह दर्शाता है कि कभी इस ग्रह पर पानी का स्तर कहाँ तक रहा होगा। यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह साबित करती है कि मंगल ग्रह आज जैसा सूखा और ठंडा रेगिस्तान हमेशा से नहीं था, बल्कि लगभग 3.7 अरब साल पहले यहाँ नदियों, झीलों और एक विशाल महासागर का अस्तित्व हुआ करता था।
इस शोध के मुख्य लेखक अब्दुल्ला ज़की का कहना है कि यह प्राचीन महासागर उस दौर में मौजूद रहा होगा जब मंगल ग्रह पर एक सक्रिय जल चक्र था। जैसे-जैसे ग्रह सूखता गया, यह महासागर धीरे-धीरे गायब हो गया, हालांकि वह पानी कहाँ गया यह आज भी शोध का विषय बना हुआ है। वैज्ञानिकों ने नासा के मार्स ग्लोबल सर्वेयर से प्राप्त टोपोग्राफिकल डेटा का इस्तेमाल करके उन रेखाओं को पहचाना है जो समुद्र के किनारों की ढलान को दर्शाती हैं। यह संरचना वैसी ही है जैसे समुद्र की लहरें और नदियाँ मिट्टी और रेत को जमा करके एक ढाल बनाती हैं। दिलचस्प बात यह है कि चीन के झुरोंग रोवर ने भी पिछले साल कुछ ऐसे सबूत जुटाए थे जो बताते हैं कि मंगल की सतह के नीचे प्राचीन समुद्र के रेतीले किनारे दबे हो सकते हैं। यह पूरा शोध 'नेचर' पत्रिका में प्रकाशित हुआ है, जो बताता है कि मंगल का यह उत्तरी महासागर ग्रह के लगभग एक-तिहाई हिस्से को कवर करता था, जो पृथ्वी के कुल समुद्री क्षेत्र के 13 प्रतिशत के बराबर है।
उत्तर वर्ल्ड के पाठकों के लिए यह समझना ज़रूरी है कि इस खोज का सीधा संबंध जीवन की संभावनाओं से जुड़ा है। अगर मंगल पर करोड़ों सालों तक इतना विशाल महासागर मौजूद था, तो इसका मतलब है कि वहां का वातावरण जीवन के पनपने के लिए अनुकूल रहा होगा। कैलटेक के वैज्ञानिक माइकल लैम्ब का मानना है कि मंगल ग्रह पहले आज की तुलना में पृथ्वी के बहुत करीब दिखता था। हालांकि अरबों वर्षों की ज्वालामुखी गतिविधियों और धूल भरी हवाओं ने इन प्राचीन भू-आकृतियों को काफी हद तक बदल दिया है, लेकिन फिर भी तटीय शेल्फ के ये निशान मिट नहीं पाए हैं। यह खोज न केवल अंतरिक्ष विज्ञान के लिए एक मील का पत्थर है, बल्कि यह भविष्य के उन मिशनों को भी दिशा देगी जो मंगल पर रोवर भेजकर वहां की तलछटी चट्टानों और परतों का अध्ययन करना चाहते हैं। अगर हम मंगल पर जीवन के अवशेषों की तलाश करना चाहते हैं, तो ये प्राचीन तटीय इलाके सबसे बेहतरीन जगह साबित हो सकते हैं, क्योंकि यहाँ कभी पानी और ज़मीन का मिलन होता था।