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ईरान में खौफ का साया: युद्ध और दमन के बीच 'प्रतिशोध' के मूड में इस्लामिक शासन

By Uttar World Desk

05 मई, 2026 | 12:03 बजे
ईरान में खौफ का साया: युद्ध और दमन के बीच 'प्रतिशोध' के मूड में इस्लामिक शासन

तेहरान/लंदन: ईरान की सड़कों पर आज भी वही तस्वीरें चस्पा हैं, जो सालों से वहां के सार्वजनिक जीवन का हिस्सा रही हैं। कहीं मारे गए नेताओं के चेहरे हैं, तो कहीं नए शासकों की गंभीर मुद्राएं। एक लंबा युद्ध, फिर संघर्ष विराम और अनगिनत विरोध प्रदर्शनों के बाद भी ईरान में 'इस्लामिक रिपब्लिक' का शासन न केवल कायम है, बल्कि बीबीसी की एक विशेष रिपोर्ट के अनुसार, यह पहले से कहीं अधिक मजबूत और प्रतिशोधी मूड में नजर आ रहा है।

तेहरान में रहने वाले एक शिक्षित और मध्यम वर्गीय जोड़े, साना और डियाको (बदले हुए नाम), की कहानी आज के ईरान की असल तस्वीर पेश करती है। डियाको को उम्मीद थी कि युद्ध और अंतरराष्ट्रीय दबाव के बाद हालात बदलेंगे, लेकिन साना की हंसी में छिपा दर्द हकीकत बयां करता है। साना कहती हैं, "देश अब रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के हाथों में है। सब कुछ बिखर गया है।" युद्ध के शुरुआती दौर में जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान के सैन्य ठिकानों और बड़े नेताओं को निशाना बनाया, तो साना जैसे कई लोग खुश थे कि शायद अब कट्टरपंथी शासन का अंत होगा।

लेकिन जैसे-जैसे युद्ध खिंचा, लोगों को समझ आया कि सर्वोच्च नेता आयतुलला अली खामेनेई और अन्य वरिष्ठ हस्तियों के जाने के बाद भी शासन कमजोर नहीं हुआ। साना कहती हैं, "उनकी जगह लेने के लिए कई लोग खड़े थे। मैंने जो सोचा था वह सच नहीं हुआ। सब कुछ बदतर हो गया और अंत में इस्लामिक रिपब्लिक ही बचा रहा"।

ईरान के भीतर सक्रिय मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और वकीलों के बीच इस समय 'पूर्वाभास' का माहौल है। उन्हें डर है कि एक बार युद्ध पूरी तरह खत्म होने के बाद, सरकार आंतरिक विरोधियों को कुचलने के लिए और अधिक हिंसक अभियान चलाएगी। वाशिंगटन स्थित मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की समाचार एजेंसी (HRANA) के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले जनवरी में विरोध प्रदर्शनों के दौरान 53,000 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया था। युद्ध शुरू होने के बाद से यह संख्या और बढ़ गई है।

चिंताजनक बात यह है कि राजनीतिक कैदियों को फांसी देने के मामले में रिकॉर्ड वृद्धि हुई है। युद्ध के दौरान मात्र कुछ समय के भीतर 21 लोगों को फांसी दी गई, जो पिछले 30 वर्षों में सबसे अधिक है। इनमें से कई लोग जनवरी के प्रदर्शनों से जुड़े थे, जबकि कुछ पर जासूसी या विपक्षी समूहों का सदस्य होने का आरोप था।

कैदियों के लिए काम करने वाली एक वकील 'सुसान' (बदला हुआ नाम) बताती हैं कि जेलों की स्थिति अब बहुत भयावह हो गई है। पहले केवल उन लोगों के साथ सख्ती की जाती थी जो सशस्त्र थे या प्रदर्शनों का नेतृत्व कर रहे थे, लेकिन अब आम कैदियों पर भी जुल्म बढ़ गया है। सुसान का मानना है कि शासन युद्ध की अपनी सारी खुन्नस कैदियों पर निकाल रहा है।

पत्रकारों के लिए भी हालात बद से बदतर हो गए हैं। 'आरमिन' नाम के एक स्वतंत्र पत्रकार ने बताया कि अब केवल युद्ध की रिपोर्टिंग करना भी 'जासूसी' के दायरे में आ सकता है, जिसकी सजा सीधे मौत है। "पहले हमें राजनीतिक अपराध के लिए पकड़ा जाता था, लेकिन अब हम पर सीधे जासूसी का आरोप मढ़ दिया जाता है," आरमिन कहते हैं। आज के ईरान में पत्रकार और एक्टिविस्ट अब बदलाव लाने के लिए नहीं, बल्कि खुद को और अपने परिवार को जीवित रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

ईरान में इस समय विपक्ष सड़कों से गायब है। शासन ने मौत और जिंदगी पर अपना पूर्ण नियंत्रण बना लिया है। तेहरान की गलियों में लोग जागकर रातें काट रहे हैं, यह सोचकर कि आने वाला कल उनके लिए क्या नई मुसीबत लेकर आएगा। यह न केवल एक शासन की मजबूती की कहानी है, बल्कि उन करोड़ों सपनों के टूटने की भी कहानी है जिन्होंने एक स्वतंत्र और उदार ईरान की कल्पना की थी।

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