उत्तर वर्ल्ड न्यूज डेस्क: मध्य पूर्व में ईरान और अमेरिका के बीच गहराते युद्ध के बादलों ने पूरी दुनिया को चिंता में डाल दिया है। लेकिन इस तनावपूर्ण माहौल के बीच दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था 'चीन' अपनी चालें बेहद खामोशी और चतुराई से चल रहा है। बीजिंग इस पूरे संकट को एक अवसर के रूप में देख रहा है, जहाँ वह खुद को अमेरिका के मुकाबले एक बेहतर और शांत विकल्प के रूप में पेश कर रहा है।
जहाँ एक तरफ अमेरिका मध्य पूर्व में सैन्य हस्तक्षेप, कड़े प्रतिबंधों और हथियारों की आपूर्ति के जरिए अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है, वहीं चीन ने एक अलग रास्ता चुना है। चीन दुनिया को यह संदेश दे रहा है कि वह 'हस्तक्षेप' में नहीं बल्कि 'विकास और कूटनीति' में यकीन रखता है। वह खुद को एक ऐसे वैश्विक नेता के रूप में दिखा रहा है जो युद्ध की नहीं, बल्कि सुलह की बात करता है।
चीन उन देशों (Global South) का भरोसा जीत रहा है जो अक्सर पश्चिमी देशों की दखलंदाजी से परेशान रहते हैं। चीन की रणनीति यह दिखाने की है कि वह किसी पक्ष पर दबाव डालने के बजाय बातचीत का रास्ता खोलता है। ईरान के साथ चीन के गहरे व्यापारिक और तेल के संबंध हैं। इस संकट के बीच भी चीन अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए ईरान के साथ खड़ा दिख रहा है, जिससे उसे भविष्य में सस्ते तेल और एक मजबूत सहयोगी की गारंटी मिल रही है। रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अमेरिका मध्य पूर्व के इस दलदल में फंसता है, तो उसका ध्यान दक्षिण चीन सागर और ताइवान जैसे मुद्दों से हट जाएगा। यह चीन के लिए अपने पड़ोस में अपना दबदबा बढ़ाने का सबसे सुनहरा मौका होगा। चीन बार-बार अपनी उस कूटनीतिक जीत की याद दिला रहा है जब उसने सऊदी अरब और ईरान के बीच वर्षों पुरानी दुश्मनी को खत्म कराया था। वह साबित करना चाहता है कि शांति के लिए गोलियों की नहीं, बल्कि सही नीयत की जरूरत है।
कुल मिलाकर, ईरान युद्ध की इस स्थिति में चीन एक मूक दर्शक नहीं बल्कि एक सक्रिय खिलाड़ी है। वह बहुत ही बारीकी से दुनिया को यह यकीन दिलाने में जुटा है कि अब अमेरिकी प्रभुत्व का दौर खत्म हो रहा है और चीन एक 'जिम्मेदार वैश्विक शक्ति' के रूप में उभर चुका है।