चीन ने अपनी पांच स्वतंत्र रिफाइनरियों के खिलाफ अमेरिका द्वारा लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों को प्रभावी ढंग से रोकने का फैसला किया है, जिससे दोनों महाशक्तियों के बीच व्यापारिक युद्ध एक नया मोड़ ले चुका है। इन छोटी और मध्यम आकार की रिफाइनरियों को वैश्विक बाजार में 'टीपॉट' रिफाइनरियों के रूप में जाना जाता है, जो चीन के औद्योगिक क्षेत्र और ऊर्जा आपूर्ति में रीढ़ की हड्डी मानी जाती हैं। अमेरिका ने इन रिफाइनरियों पर यह आरोप लगाया था कि वे उन देशों के साथ व्यापारिक गतिविधियों में शामिल हैं जिन पर अंतरराष्ट्रीय पाबंदियां लगी हुई हैं। अमेरिका का उद्देश्य इन प्रतिबंधों के जरिए चीन की ऊर्जा खरीद श्रृंखला को बाधित करना था, लेकिन बीजिंग ने इसे अपनी आर्थिक संप्रभुता में सीधा हस्तक्षेप करार दिया है।
चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा है कि वह अपनी कंपनियों के हितों की रक्षा के लिए हर संभव कानूनी और कूटनीतिक कदम उठाएगा। चीनी सरकार ने इन रिफाइनरियों को सुरक्षा कवच प्रदान करते हुए घरेलू बैंकों और संस्थानों को अमेरिकी निर्देशों का पालन न करने के गुप्त संकेत दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इन रिफाइनरियों पर प्रतिबंधों का असर न होने देने के लिए चीन ने अपनी वित्तीय प्रणाली में ऐसे बदलाव किए हैं जिससे अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम हो सके। यह कदम न केवल इन कंपनियों को बचाएगा बल्कि वैश्विक तेल बाजार में चीन के दबदबे को भी बरकरार रखेगा, क्योंकि ये रिफाइनरियां भारी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करती हैं।
इस घटनाक्रम ने वाशिंगटन और बीजिंग के बीच चल रहे कूटनीतिक तनाव को और अधिक हवा दे दी है। चीन का यह फैसला दर्शाता है कि वह अब अपनी घरेलू कंपनियों के संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय दबाव की चिंता नहीं करता है। यदि ये प्रतिबंध प्रभावी हो जाते, तो शेडोंग प्रांत के औद्योगिक क्षेत्र में हजारों नौकरियों पर संकट आ सकता था और तेल की कीमतों में अस्थिरता पैदा हो सकती थी। चीन द्वारा अमेरिकी कार्रवाई को ब्लॉक किए जाने के बाद अब यह स्पष्ट हो गया है कि भविष्य में वैश्विक व्यापारिक नीतियों पर वर्चस्व की यह लड़ाई और भी आक्रामक होगी। बीजिंग ने साफ कर दिया है कि अमेरिका अपनी घरेलू नीतियों को दूसरे देशों की व्यापारिक इकाइयों पर जबरन नहीं थोप सकता है।