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मणिपुर में क्यों नहीं बुझ रही हिंसा की आग? तीन साल से जारी जातीय संघर्ष का पूरा सच

By Uttar World Desk

22 अप्र, 2026 | 07:19 बजे
मणिपुर में क्यों नहीं बुझ रही हिंसा की आग? तीन साल से जारी जातीय संघर्ष का पूरा सच

उत्तर वर्ल्ड न्यूज डेस्क (22 अप्रैल, 2026): उत्तर-पूर्वी राज्य मणिपुर आज भी अशांति के दौर से गुजर रहा है। मई 2023 में शुरू हुई जातीय हिंसा को अब तीन साल होने को आए हैं, लेकिन शांति की कोई ठोस किरण नजर नहीं आ रही है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, अप्रैल 2026 में भी राज्य के कई हिस्सों में रॉकेट और ड्रोन हमलों जैसी नई तकनीक से हिंसा भड़कने की खबरें आई हैं, जिसने सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ा दी है।

मणिपुर में जारी इस संघर्ष के पीछे दशकों पुराना जातीय और भौगोलिक विभाजन है, लेकिन तत्कालीन चिंगारी 2023 के एक अदालती आदेश से सुलगी थी 14 अप्रैल 2023 को मणिपुर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह बहुसंख्यक 'मैतेई' समुदाय को अनुसूचित जनजाति (ST) में शामिल करने पर विचार करे। पहाड़ी इलाकों में रहने वाले 'कुकी-जो' समुदायों ने इसका कड़ा विरोध किया, क्योंकि उन्हें डर था कि इससे उनकी जमीनों और नौकरियों पर मैतेई समुदाय का कब्जा हो जाएगा। मणिपुर की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि घाटी (इम्फाल) में मैतेई रहते हैं और चारों ओर की पहाड़ियों में कुकी और नागा जनजातियां। यह संघर्ष अब पूरी तरह से 'घाटी बनाम पहाड़ी' की जंग बन चुका है।

विशेषज्ञों और स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, हिंसा के लंबा खिंचने के पीछे कई गहरे कारण हैं हिंसा के शुरुआती दिनों में सरकारी शस्त्रागारों से लूटे गए हजारों आधुनिक हथियार अभी भी उपद्रवियों के हाथ में हैं। मोर्टार, रॉकेट और अब ड्रोन का इस्तेमाल इस जंग को और खतरनाक बना रहा है।  राज्य अब दो हिस्सों में बंटा हुआ है। केंद्रीय सुरक्षा बलों ने समुदायों के बीच 'बफर जोन' बनाए हैं, लेकिन किसी भी पक्ष को दूसरे के इलाके में जाने की अनुमति नहीं है। समुदायों के बीच संवाद पूरी तरह टूट चुका है। मणिपुर की सीमा म्यांमार से लगती है, जहाँ से अवैध घुसपैठ और अफीम की खेती (नारकोटिक्स) इस संघर्ष को ईंधन दे रही है। 'ड्रग्स पर युद्ध' (War on Drugs) के सरकारी अभियान को भी एक पक्ष ने खुद के खिलाफ लक्षित कार्रवाई माना। मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह के इस्तीफे (9 फरवरी 2025) के बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया गया था, जो अभी भी जारी है। राज्यपाल और केंद्र सरकार शांति बहाली की कोशिशों में जुटे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर तनाव बरकरार है।

अबतक कितना नुकसान हुआ : आधिकारिक आंकड़ों और 'उत्तर वर्ल्ड न्यूज' की पड़ताल के अनुसार, 260 से अधिक लोग अपनी जान गंवा चुके हैं।60,000 से ज्यादा लोग आज भी राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं। 4,500 से अधिक घर और लगभग 400 धार्मिक स्थल (चर्च और मंदिर) जलाए जा चुके हैं।

मणिपुर की आग को बुझाने के लिए केवल सैन्य बल काफी नहीं है। जब तक मैतेई और कुकी समुदायों के बीच दिल और दिमाग की दूरियां कम नहीं होंगी और लूटे गए हथियार वापस नहीं आएंगे, तब तक स्थायी शांति की उम्मीद करना मुश्किल है। केंद्र सरकार द्वारा गठित जांच आयोग की रिपोर्ट 20 मई 2026 तक आने की संभावना है, जिससे मामले में नई दिशा मिल सकती है।

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