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मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध को लेकर अरविंद केजरीवाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील पर उठाए सवाल और केंद्र की विदेश नीति को घेरा

By Uttar World Desk

11 मई, 2026 | 07:54 बजे
मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध को लेकर अरविंद केजरीवाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील पर उठाए सवाल और केंद्र की विदेश नीति को घेरा

आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने एक बार फिर केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखा हमला बोला है जिससे देश की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। इस बार विवाद का केंद्र मिडिल ईस्ट में चल रहा भीषण युद्ध है जिसे लेकर प्रधानमंत्री मोदी ने हाल ही में शांति की अपील की थी और वैश्विक स्थिरता पर जोर दिया था। अरविंद केजरीवाल ने प्रधानमंत्री की इस अपील को आड़े हाथों लेते हुए कई गंभीर सवाल खड़े किए और पूछा कि जब देश के भीतर महंगाई, बेरोजगारी और सीमा सुरक्षा जैसे ज्वलंत मुद्दे मौजूद हैं तो केंद्र सरकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मध्यस्थता दिखाने में इतनी दिलचस्पी क्यों ले रही है। केजरीवाल ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से केंद्र की विदेश नीति और घरेलू प्राथमिकताओं के बीच के संतुलन पर प्रहार करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री को दुनिया को सलाह देने से पहले अपने देश की आंतरिक समस्याओं का समाधान करना चाहिए। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि मिडिल ईस्ट में शांति की बात करना अच्छी बात है लेकिन क्या प्रधानमंत्री ने मणिपुर के हालातों या किसानों की समस्याओं पर उसी तरह की सक्रियता दिखाई है जैसी वे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दिखा रहे हैं।

यह सियासी घमासान ऐसे समय में हो रहा है जब पूरी दुनिया की नजरें मिडिल ईस्ट के तनावपूर्ण हालातों पर टिकी हैं और भारत अपनी वैश्विक छवि को एक जिम्मेदार शक्ति के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है। भाजपा ने केजरीवाल के इन सवालों पर तुरंत पलटवार करते हुए उन्हें अंतरराष्ट्रीय मामलों में कम समझ रखने वाला नेता बताया है। भाजपा प्रवक्ताओं का कहना है कि भारत एक विश्व गुरु के रूप में अपनी भूमिका निभा रहा है और प्रधानमंत्री की अपील भारत के बढ़ते वैश्विक प्रभाव का प्रमाण है। दूसरी ओर केजरीवाल का तर्क है कि आम आदमी के मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए अक्सर अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का सहारा लिया जाता है। केजरीवाल ने सीधे तौर पर सवाल किया कि प्रधानमंत्री की इन अपीलों का भारत की अर्थव्यवस्था या यहां के मध्यम वर्ग के जीवन पर क्या सकारात्मक प्रभाव पड़ने वाला है। उन्होंने आरोप लगाया कि जब देश का युवा रोजगार के लिए भटक रहा है और महंगाई आसमान छू रही है तब सरकार अपनी ऊर्जा उन जगहों पर लगा रही है जहां उसकी भूमिका केवल सलाहकार की है।

आम आदमी पार्टी और भाजपा के बीच यह टकराव केवल बयानों तक सीमित नहीं है बल्कि यह 2026 के राजनीतिक नैरेटिव को तय करने की एक कोशिश भी मानी जा रही है। केजरीवाल लगातार खुद को एक ऐसे नेता के रूप में पेश कर रहे हैं जो ग्लोबल विजन के बजाय लोकल मुद्दों और आम आदमी की बुनियादी जरूरतों को प्राथमिकता देता है। उन्होंने कहा कि भारत को अपनी सैन्य और कूटनीतिक शक्ति का उपयोग पहले अपनी सीमाओं को सुरक्षित करने के लिए करना चाहिए न कि केवल अंतरराष्ट्रीय प्रशंसा बटोरने के लिए। इस विवाद ने सोशल मीडिया पर भी एक बड़ी बहस को जन्म दे दिया है जहां लोग प्रधानमंत्री की वैश्विक शांति की पहल और केजरीवाल के घरेलू मुद्दों वाले स्टैंड के बीच बंटे नजर आ रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केजरीवाल का यह हमला शहरी मध्यम वर्ग को यह संदेश देने की कोशिश है कि सरकार की प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं।

मिडिल ईस्ट के युद्ध ने दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित किया है और भारत भी इससे अछूता नहीं है। केजरीवाल ने इसी बिंदु को पकड़ते हुए सरकार से पूछा कि तेल की बढ़ती कीमतों और सप्लाई चेन में आने वाली बाधाओं से भारतीयों को बचाने के लिए क्या ठोस कदम उठाए गए हैं। उन्होंने कहा कि केवल शांति की अपील करने से काम नहीं चलेगा बल्कि सरकार को देश के भीतर आर्थिक सुरक्षा कवच तैयार करना चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी पर किया गया यह सीधा हमला आने वाले दिनों में और भी उग्र हो सकता है क्योंकि विपक्षी दल अब सरकार की विदेश नीति को सीधे घरेलू संकटों से जोड़कर देख रहे हैं। फिलहाल इस बयानबाजी ने यह साफ कर दिया है कि 2026 की राजनीति में अंतरराष्ट्रीय घटनाएं भी अब घरेलू चुनावी अखाड़े का हिस्सा बन चुकी हैं और अरविंद केजरीवाल इस मौके को सरकार की घेराबंदी करने के लिए पूरी तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि केंद्र सरकार केजरीवाल के इन तीखे सवालों का जवाब अपने काम से देती है या फिर यह विवाद केवल एक राजनीतिक रस्साकशी बनकर रह जाता है।

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