श्रावस्ती जिले में नवजात शिशु मृत्यु दर में कमी लाने और प्रसव के तुरंत बाद होने वाली जटिलताओं से निपटने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने एक महत्वपूर्ण पहल की है। जिला अस्पताल में 'नेशनल नियोनेटल रिससिटेशन प्रोग्राम' (NRP) के तहत एक दिवसीय विशेष प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य डॉक्टरों, स्टाफ नर्सों और पैरामेडिकल स्टाफ को उन तकनीकों में निपुण बनाना है, जो जन्म के समय सांस न ले पाने वाले नवजात शिशुओं (Birth Asphyxia) के जीवन की रक्षा के लिए अनिवार्य हैं।
कार्यशाला के दौरान विशेषज्ञों ने बताया कि जन्म के बाद का पहला एक मिनट नवजात के लिए 'गोल्डन मिनट' होता है। यदि इस दौरान बच्चा खुद से सांस नहीं लेता है, तो प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मी किस प्रकार आधुनिक उपकरणों और विशेष प्रक्रियाओं (जैसे बैग और मास्क वेंटिलेशन) के जरिए उसकी सांसें वापस ला सकते हैं। प्रशिक्षण में 'डमी' (पुतले) के माध्यम से व्यावहारिक प्रदर्शन किया गया, ताकि अस्पताल का स्टाफ आपातकालीन स्थिति में बिना घबराए त्वरित कार्रवाई कर सके।
स्वास्थ्य अधिकारियों ने इस बात पर जोर दिया कि जिले के दूर-दराज के इलाकों में स्थित सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर भी ऐसी स्किलिंग की आवश्यकता है। प्रशिक्षण में हिस्सा ले रहे कर्मियों को संबोधित करते हुए मुख्य चिकित्सा अधीक्षक ने कहा कि नवजात शिशु देखभाल की छोटी-छोटी बारीकियां बड़े बदलाव ला सकती हैं। कार्यशाला में थर्मल रेगुलेशन (बच्चे को गर्म रखना), समय पर नाल काटना और श्वसन मार्ग की सफाई जैसे महत्वपूर्ण बिंदुओं पर विस्तृत चर्चा की गई।
श्रावस्ती जैसे आकांक्षी जिले में स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे के साथ-साथ मानव संसाधन को तकनीकी रूप से दक्ष बनाना एक बड़ी चुनौती और जरूरत रही है। इस तरह के नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रमों से न केवल जिला अस्पताल की रेफरल दर में कमी आएगी, बल्कि स्थानीय स्तर पर ही शिशुओं को बेहतर उपचार मिल सकेगा। कार्यक्रम के अंत में भाग लेने वाले स्टाफ का मूल्यांकन भी किया गया ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वे सीखी गई तकनीकों का सही ढंग से उपयोग करने में सक्षम हैं। स्वास्थ्य विभाग की इस पहल को जिले में शिशु स्वास्थ्य सेवाओं के सुधार की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।